
मनरेगा योजना यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम VB G-RAM-G’ 2025 (MGNREGA), 2005 भारत की सबसे महत्वाकांक्षी और जनकल्याणकारी योजनाओं में से एक रही है। इस योजना का मूल उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को हर साल कम से कम 100 दिनों का अकुशल मजदूरी रोजगार उपलब्ध कराना था, ताकि ग्रामीण गरीबी, बेरोजगारी और पलायन जैसी समस्याओं पर अंकुश लगाया जा सके।
वर्तमान समय में मनरेगा से 13 करोड़ से अधिक लोग लाभान्वित हो रहे हैं, जिनमें लगभग 69% भागीदारी महिलाओं की है। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है और महिला सशक्तिकरण की दिशा में सकारात्मक संकेत भी देती है।
हाल ही में केंद्र सरकार ने मनरेगा से जुड़ा एक नया विधेयक संसद में पेश किया है, जिसका नाम है —
“VB G-RAM-G (विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन – ग्रामीण)”।
यह विधेयक 18 दिसंबर को लोकसभा में पारित हो चुका है और राज्यसभा से भी इसके पारित होने की उम्मीद जताई जा रही है।
अब सवाल यह है कि सरकार ने मनरेगा में बदलाव की जरूरत क्यों महसूस की?
VB G-RAM-G’ 2025
सरकार के अनुसार बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी?
सरकार का कहना है कि मनरेगा ने रोजगार उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर समस्याएँ भी सामने आईं, जैसे:
•मजदूरी भुगतान में देरी
•फर्जी जॉब कार्ड और भ्रष्टाचार
•उपयोगी और टिकाऊ परिसंपत्तियों (Assets) का न बन पाना
•योजना का केवल अल्पकालिक लाभ तक सीमित रह जाना
इन्हीं समस्याओं को दूर करने और योजना को रोजगार से आगे बढ़ाकर आजीविका और विकास से जोड़ने के उद्देश्य से नया बिल लाया गया है।
नए बिल में किए गए प्रमुख बदलाव
1. रोजगार के दिनों में बढ़ोतरी
पहले जहां मनरेगा के तहत 100 दिनों का रोजगार मिलता था, अब इसे बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है।
हालांकि, कृषि के व्यस्त महीनों में यह योजना अस्थायी रूप से बंद रहेगी, ताकि खेती पर नकारात्मक असर न पड़े और मजदूर समय पर कृषि कार्य के लिए उपलब्ध रहें।
2. फंडिंग पैटर्न में बदलाव
पहले मनरेगा का अधिकांश खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी।
अब नया फंडिंग मॉडल अपनाया गया है:
60% केंद्र सरकार
40% राज्य सरकार
इससे राज्यों की जवाबदेही और जिम्मेदारी बढ़ेगी, जिससे योजना के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण होने की उम्मीद है।
3. Demand Driven से Data Driven मॉडल
पहले योजना पूरी तरह मांग आधारित थी — जितनी मांग, उतना काम।
अब इसे डेटा आधारित मॉडल में बदला गया है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी ग्राम पंचायत में 800 मजदूर सक्रिय हैं और किसी अन्य में 200, तो उसी अनुपात में कार्य और फंड का आवंटन किया जाएगा। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा।
4. काम के चार प्रमुख क्षेत्र तय किए गए
अब कार्य केवल इन चार क्षेत्रों में ही होंगे:
जल सुरक्षा (Water Security):
पेयजल, सिंचाई, सूखा और बाढ़ जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान
ग्रामीण अवसंरचना (Rural Infrastructure):
सड़क, जल संरचना, सामुदायिक संपत्तियाँ
व्यक्तिगत परिसंपत्तियाँ (Individual Asset):
गरीब परिवारों के लिए निजी स्तर पर टिकाऊ संसाधन
कौशल आधारित कार्य (Skill Linked Work):
मजदूरों की स्किल डेवलपमेंट पर फोकस
यह बदलाव योजना को केवल मजदूरी तक सीमित न रखकर दीर्घकालिक विकास से जोड़ता है।
5. भुगतान प्रणाली में सुधार
अब मजदूरी का भुगतान:
साप्ताहिक (Weekly Payment) होगा
आधार लिंक्ड DBT के माध्यम से सीधे बैंक खाते में जाएगा
रीयल-टाइम एप्लिकेशन ट्रैकिंग से पारदर्शिता बढ़ेगी
इससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त होगी और मजदूरों को समय पर पैसा मिलेगा।
विपक्ष की आपत्तियाँ: पाँच बड़े मुद्दे
विपक्ष इस बिल का विरोध निम्न कारणों से कर रहा है:
महात्मा गांधी का नाम हटाना, जिसे वे अपमान मानते हैं
राज्यों पर 50,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ
रोजगार की गारंटी समाप्त होने का डर
अत्यधिक तकनीक के कारण गरीब और आदिवासी वर्ग के बाहर होने की आशंका
संसद में जल्दबाजी में बिल पास करना, पर्याप्त बहस न होना
VB G-RAM-G’ 2025
निष्कर्ष: बदलाव लाभकारी हैं या नहीं?
सरकार का दावा है कि ये बदलाव मनरेगा को अस्थायी राहत योजना से स्थायी विकास मिशन में बदल देंगे।
वहीं विपक्ष को डर है कि इससे गरीबों की सामाजिक सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
अब यह सोचने की बात है कि क्या ये सुधार वास्तव में ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाएंगे, या फिर रोजगार की गारंटी कमजोर होगी?
इसका वास्तविक उत्तर आने वाले वर्षों में ज़मीन पर दिखने वाले परिणामों से ही मिलेगा।